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आशीष पाण्डेय जिद्दी जी की कवितायें

मातृभूमि से प्रेम
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प्रेम हमारा मातृभूमि से,
अटल अमर और निश्छल है।
जननी भी कहती है बेटा,
माटी से ही निज बल है।

उड़े धूल जो महके अंबर,
मिट्टी में वो खुशबू है।
प्रेम भाव से लेप लगाकर,
हो शीतल मन वो जादू है।

बागों में जो कोयल बोले,
आनंदविभोर मन हो जाए।
देख धरा की हरियाली,
मन पंखुड़ियों सा खिल जाए।

देख लहलहाना फसलों का,
मन मोहित हो मुस्काया है,
चले पवन जो पुरवाई मन,
किसानों का महकाया है।

प्रेम घटा का देख मयूरा,
नृत्य करत लहराया है।
प्रेम किया जो कलियों से,
भवँरों ने गुंजन गाया है।

है प्रेम राग जहाँ जीवन के,
सात सुरों में पिरोया है।
याद धरा जब करे गगन को,
प्रेम भाव में रोया है।

आशीष पाण्डेय जिद्दी

पिता एक नाता ही नहीं
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पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/
संस्कार देते हैं पुत्र को
देते स्वर्णिम ज्ञान हैं/

सत्य नेक सद्मार्ग के पथ पर
हमको पिता चलाते हैं/
देशधर्म कुल मर्यादा का '
हमको पाठ पढ़ाते हैं/
पिता देवता तुल्य हमारे
पिता वेद की खान हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/

पिता सदा बरगद की छाया
बनकर हमें छुपाते हैं/
पाप द्वेष दुख बाधा से वो
नित नित हमें बचाते हैं/
पिता हमारे जीवन रक्षक
हम सबके वो प्रान हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/

बिना पिता कोई पुत्र न जन्में
पिता जनक कहलाते हैं/
रक्त पिता का दूध मात का'
मिल ममता सिखलाते हैं/
प्रथम गुरु है मात हमारी'
पिता बने पहचान हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/

तिनका तिनका जोड़ पिता ही
प्यार का नीड़ बनाते हैं/
हम बच्चों की खातिर क्या क्या
दिल में दर्द छुपाते हैं/
नित अपने परिवार का पोषण
करते पिता अविराम हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/

बचपन से लेकर जीवन भर
हम पर प्रेम लुटाते हैं/
ऐसे मात पिता को फिर क्यूँ
बच्चे आज भुलाते हैं/
अपने पैर खड़े होते ही
करते क्यूँ अपमान हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/

जैसे दरख्तों में पंछी सब
अपना नीड़ बनाते हैं/
उसी भाँति बचपन में हम सब
पिता से आस लगाते हैं/
गिरा दरख्तों को न देना
ये तो देव समान हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/

पिता धर्म है पिता वेद है
पिता पुण्य का धाम है/
माँ का रूप छिपा पिता में
पिता ब्रह्म का नाम है/
पिता हमारे जीवनदाता
हम सबका अभिमान हैं/
पिता एक नाता ही नहीं हैं
पिता एक वरदान हैं/
             
आशीष पान्डेय  जिद्दी

        बेटी की  विदाई
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सज के बेटी जब चली है,डोली में ससुराल को
कैसे कोई कवि लिखे,उस पल पिता के हाल को
       
माँ तो रोई फूटकर, बेटी पराई हो गई
घर की बगिया से यूँ बुलबुल, की बिदाई हो गई
भूलेगी कैसे ये बगिया, बुलबुल अपनी डाल को
सज के बेटी जब चली है, डोली में ससुराल को,

बाँहों में झूली पिता के, बनके बेटी लाड़ली
सारे घर में झूमती थी,प्यारी सी वो बावली
कैसे भूलें माँ पिता अब, उस समय की चाल को
सज के बेटी जब चली है, डोली में ससुराल को

जन्मी थी नन्ही परी सी, खुशियों की सौगात ले
देखो कैसे आज दूल्हा, आया है बारात ले
याद करते हम रहेंगे, दिन महीने साल को
सज के बेटी जब चली है,डोली में ससुराल को।

आशीष पान्डेय जिद्दी


भाई के सपने
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आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा
हांथों से तुझको मै डोली बिठाऊँगा
रोएगी तू भी और रोऊँगा मैं भी
बहना तुझे मैं कसे भुलाऊँगा
आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा।

लहंगा मै लाऊँगा  मेंहदी मैं लाऊँगा
हांथों में तेरे मै खुद ही लगाऊँगा
डोली उठोगी तो रोऊँगा गाऊँगा
आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा।

परियों से सुन्दर तू बहना लगेगी
दुल्हन के जोड़े में ऐसी सजेगी
मंडप से डोली तक कलियाँ बिछाऊँगा
आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा

वो तेरी शरारत वो मेरा सताना
तेरा रूठ जाना वो मेरा मनाना
बहना तेरे बिन मैं किसको सताऊँगा
आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा

मिलेगा नया घर तुझे मेरी बहना
दुआ है मेरी तू सदा हँसती रहना
खुशियाँ तेरी देख मै मुस्कुराऊँगा
आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा

कभी भी तू मुझसे नहीं दूर जाना
बुलाऊँगा जब भी मेरे पास आना
यादों को तेरी मैं घर में बसाऊँगा
आएगा एक दिन मैं तुझको सजाऊँगा।

आशीष पान्डेय जिद्दी

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