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जो देखे थे सपने

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 जो देखे थे सपने जो देखे  थे  सपने, वो  पूरे  हो  रहे  हैं, हर मुकाम पर अपने, सब  आगे बढ़  रहे हैं । आँखों में जो कल तक सपने  सज  रहे  थे, मेहनत के दम पर अब उनकी ताबीर बन रही है। जो   करते  हैं  कर्म, और  थकते  नहीं  हैं, उनकी राहों में फलक की तस्वीर  बन   रही  है । जिनको  है  दुनियावी समझदारी की समझ, उनके  हाथों  में  अब नई तक़दीर बन रही है । जो देखे  थे  सपने, वो  पूरे   हो  रहे  है, हर मुकाम पर अपने, सब  आगे  बढ़ रहे  हैं । हौसलों  की  रोशनी,  हर दिल में जग रही है, सच की इस मेहनत से  दुनिया  संवर  रही  है । मेहनत की इस राह में, रोशनी  उतर  रही  है, जो चलते  है सच  पर, उनकी  जीत बन‌ रही है । © डॉ. राहुल शुक्ल साहिल

ताबीर

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देखे थे सपने, वो पूरे हो रहे हैं, हर मुकाम पर अपने, सब आगे बढ़ रहे हैं। आँखों में जो कल तक सपने सज रहे थे, मेहनत के दम पर अब उनकी ताबीर बन रही है। जो करते हैं कर्म, और थकते नहीं हैं, उनकी राहों में फलक की तस्वीर बन रही है। जिनको है दुनियावी समझदारी की समझ, उनके हाथों में अब नई तक़दीर बन रही है। © डॉ. राहुल शुक्ल साहिल

एक पौधा एक संकल्प

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       🌿 एक पौधा, एक संकल्प 🌿 सकल धरा सुंदर बने, पौधे हों चहुँ ओर। मिलकर संरक्षण करें, सुखमय होगा भोर॥ धरती माँ का यह संदेश, रखना प्रकृति का ध्यान विशेष। पेड़  लगाओ, धरा  बचाओ, हो  हरियाली चहुँ ओर। स्वच्छ, सुंदर वातावरण से, महके जीवन का  हर छोर। नदियाँ निर्मल, वन हरियाले, जीवन  में चहुँ ओर उजाले। पक्षी  गाएँ  मधुर तराने, खुशहाली के नए तराने। स्वच्छ हवा का हो अधिकार, यही प्रकृति का है उपहार। जल, जंगल और ज़मीन बचाएँ, आने  वाला  कल  मुस्कुराएँ। मिलकर धरती  को  सजाएँ, एक  पौधा  हम  सभी लगाएँ। हरित भविष्य का स्वप्न सजाएँ, आओ  मिलकर  उसे बनाएँ। "हर  घर  एक  पौधा  हो, धरती का फिर सौंदर्य हो। © डॉ. राहुल शुक्ल साहिल 

सफलता की पुकार

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     सफलता की पुकार सफल वो हैं, सफल हम हैं, सफलता कह  रही हमसे ! गगन सी ऊँचाई पर भी, फूल  खिल  ही जाते  हैं।  कठिन हो राह जितनी भी, सहारे  मिल  ही  जाते हैं। लगन, श्रद्धा, परिश्रम से, सफलता पा ही जाते हैं ।  कभी  ऊपर, कभी नीचे, यही  प्रेरक  सिखाते  हैं। अंधेरी  रात  गहरी  हो, सवेरा आ  ही  जाता है।  मनुज सागर-सी मुश्किल में, किनारा  पा  ही  जाता  है। अगर हो लक्ष्य निर्धारण, प्रकृति सम्मान करती है।  नीयत हो आपकी सच्ची, तो  दुनिया  गान करती है। सफलता की कहानी ही, तेरा  यशगान  करती  है।  जो थककर हारता ना हो, उसी  का  मान‌  करती है। जो खाकर ठोकरें मानुष, उठकर फिर से चलता है। सतत अभ्यास ही सच्ची, जीवन  की  सफलता  है। सफल वो हैं, सफल हम हैं, सफलता  कह  रही  हमसे ! © डॉ. राहुल शुक्ल 'साहिल'

खूबसूरत शाम

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              खूबसूरत शाम  नाराज़गी की भी कोई ख़ूबसूरत शाम होने दो, उल्फ़त को मोहब्बत का मुकम्मल अंजाम होने दो। इससे–उससे, जाने किस–किस से मिले हैं रास्ते, हर किसी से मुहब्बत का कोई नाम होने दो। जो मिला है दर्द, उसे भी कोई पैग़ाम समझो, हर एक ज़ख़्म को आज दिल का पैग़ाम होने दो। बिछड़ कर भी जो महके, वही रिश्ता है असल, यादों को भी कुछ लम्हों का अरमान होने दो। हमने सीखा है सहना भी मुस्कुराकर यहाँ, हर इक शिकवा–गिला अब बे-ज़ुबान होने दो। “साहिल” तजुर्बों से ही मुकम्मल हुआ है इश्क़, हर अंजाम को आख़िर एक शाम होने दो ।।    © डॉ. राहुल शुक्ल साहिल

ग़ज़ल

ग़ज़ल  पुराने ग़म को दिल से आज उतारो यारो, नया सवेरा है, ख़ुद को सँवारो यारो। जो बीत गया, उसे सब्र का नाम दे दो, नव वर्ष आया है, दीप जला दो यारो। थकी हुई साँसों को थोड़ा सा विश्वास दो, टूटे ख़्वाबों में फिर रंग निखारो यारो। नफ़रतों की ये दीवार अब गिरनी चाहिए, मुहब्बत से ज़माने को पुकारो यारो। अँधेरों ने बहुत दिन हमें बाँधे रखा, अब उजालों से रिश्ता सुधारो यारो। साहिल की मंज़िल ये आख़िरी नहीं है, उम्मीद की कश्ती को बहने दो यारो। © डॉ. राहुल शुक्ल साहिल

प्राकृतिक सन्देश

      प्राकृतिक सन्देश दीपक की लौ में भी संघर्ष लिखे जाते हैं, रात की ख़ामोशी में उत्कर्ष लिखे जाते हैं, जो सीख ले मुश्किलों से निकलकर चलना, उनके जीवन-पृष्ठों पर सुख–हर्ष लिखे जाते हैं। हवाओं की सरसराहट में भी संवाद होते हैं, पेड़-पौधों के भी आपस में वाद होते हैं, जो सुन सके प्रकृति के मौन की गूढ़ भाषा, उनकी हर आहट में सुकून भरे नाद होते हैं। पेड़ों की छाँह में भी उपदेश बसते हैं, माटी की ख़ुशबू में गहरे संदेश रचते हैं, जो समझ सके प्रकृति के सौंदर्य की प्रेरणा, उनके जीवन में सुंदर परिवेश सजते हैं। नदियों की धार में भी इकरार बहते हैं, पत्थर की चुप्पी में भी स्वीकार रहते हैं, जो मौन की भाषा को हृदय से समझ पाए, क्योंकि ख़ामोशी में ही सच्चे संवाद रहते हैं। पंछी की चूँ - चूँ में भी अल्फ़ाज़ होते हैं, बिन शब्दों के भी बोली के साज़ होते हैं, ये प्राणी अकसर इंसानों से अच्छे होते हैं, उनकी ख़ामोशी में ख़्वाबों के परवाज़ होते हैं। © डॉ• राहुल शुक्ल ‘साहिल’