ग़ज़ल

ग़ज़ल 

पुराने ग़म को दिल से आज उतारो यारो,
नया सवेरा है, ख़ुद को सँवारो यारो।

जो बीत गया, उसे सब्र का नाम दे दो,
नव वर्ष आया है, दीप जला दो यारो।

थकी हुई साँसों को थोड़ा सा विश्वास दो,
टूटे ख़्वाबों में फिर रंग निखारो यारो।

नफ़रतों की ये दीवार अब गिरनी चाहिए,
मुहब्बत से ज़माने को पुकारो यारो।

अँधेरों ने बहुत दिन हमें बाँधे रखा,
अब उजालों से रिश्ता सुधारो यारो।

साहिल की मंज़िल ये आख़िरी नहीं है,
उम्मीद की कश्ती को बहने दो यारो।

© डॉ. राहुल शुक्ल साहिल

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