Saturday, 22 June 2019

अनुशासन




             त्रिपदिक जनक छंद

संस्कृत के प्राचीन त्रिपदिक छंदों (गायत्री, ककुप आदि) की तरह जनक छंद में भी ३ पद (पंक्तियाँ) होती हैं. दोहा के विषम (प्रथम, तृतीय) पद की तीन आवृत्तियों से जनक छंद बनता है. प्रत्येक पद में १३ मात्राएँ तथा पदांत में लघु गुरु या लघु लघु लघु होना आवश्यक है. पदांत में सम तुकांतता से इसकी सरसता तथा गेयता में वृद्धि होती है. प्रत्येक पद दोहा या शे'र की तरह आपने आप में स्वतंत्र होता है .

जनक छंद की बात की जाए तो इसके पाँच भेद हैं🌺💐💐👌

1- शुद्ध जनक छंद - जहाँ पहले और अंतिम पद की तुक मिले।
2- पूर्व  जनक  छंद- पहले दो पद तुकांत
3- उत्तर जनक छंद- अंत के दो पद तुकांत
4- घन  जनक छंद - तीनों पद तुकांत
5- सरल जनक छंद- तीनों पद अतुकांत।

राम नाम  ही सार है
राम राम  कहते रहो
समझो नौका पार है
      ~शैलेन्द्र खरे "सोम"

🌷💐🌷💐🌷💐🌷🌷


1- शुद्ध जनक छंद - जहाँ पहले और अंतिम पद की तुक मिले।
तारा नयन कमाल है|
सुन्दर सूरत देखकर|
बिगड़ा  मेरा हाल है|

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2- पूर्व   जनक  छंद - पहले दो पद तुकांत

मनभावन सा साथ है|
संग  मीत का  हाथ है|
जीवन सुखमय प्रेम से|

3- उत्तर जनक  छंद - अंत के दो पद तुकांत

सत्य सार यह जान लो।
मधुर  प्रीति  ही सार है।
जग  झंझट  बेकार  है।

4. घन जनक छंद

प्रेम दान भी  दीजिए|
स्नेह सभी से कीजिए|
सेवा भाव भर लीजिए|

5- सरल जनक  छंद - तीनों पद अतुकांत।

प्रेम  हृदय  का भोज है|
सब जन में सहकार हो|
यही  सत्य सब जान लें|

    © डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'



Tuesday, 4 June 2019

रमेश छन्द (डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल')

     🎍रमेश छंद🎍
विधान~ [नगण यगण नगण जगण]
( 111  122  111  121 )
12 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]

मुदमय  तारा  मधुरिम  रूप|
प्रियतम है तू  सुखद अनूप||
तन - मन चाहे प्रतिपल नेह|
हृदय  बसा है सुरमय स्नेह||

©डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

Tuesday, 28 May 2019

कुसुमविचित्रा छन्द (यौवन)



    🎍 कुसुमविचित्रा छंद 🎍

विधान~
[नगण यगण नगण यगण]
(111  122  111 122 )
12 वर्ण, 4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत

हर पल  चाहूँ  प्रियवर छाया|
मधुरिम लागे उजियर काया||
हलचल  जैसे  सरगम  धारा|
हिय सुख पाऊँ लखकर तारा||

सुखद धनी यौवन सुख पाए|
सरस वही  मोहक मन भाए||
सुखद  लगे नैनन  मन भाषा|
समझ गया चाहत परिभाषा||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

Monday, 20 May 2019










मुक्तक १२२२*४

दिलों की हलचलें समझो जरा तुम प्यार तो कर लो,
बढ़ी है धड़कने सुन लो, जरा इजहार तो कर लो,
वही अब  बन गई है  जिन्दगी की हमसफर मेरी,
फसाने  प्रेम के मेरे  सही  स्वीकार  तो  कर  लो|

     ❤ साहिल 🙏


        बेल/लता  🎊
   _(1222×4 मुक्तक)_
गले जब तुम लगाती हो उमंगे जाग जाती है|
इशारे देखकर चाहत शराफ़त भाग जाती है|
लता जैसे लिपटकर पेड़ को साथी  बनाती है|
मुहब्बत़ की रवानी बेल सी चढ़ती हि जाती है|

  © डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

Thursday, 16 May 2019

शुभमाल छन्द जय श्री राम. (माँ गोदावरी की आरती, रामघाट, चित्रकूट, विडियो)

 
           🌲 शुभमाल छन्द 🌲
       जगण जगण (121 121)

हरो  दुख  पीर|
भरो  मन  धीर||
भजो  प्रभु नाम|
करो शुभ काम||

भरो  मन  आस|
हिया विभु प्यास||
रहे    सहकार |
करे   जयकार||

बली   हनुमान|
मिले सुख ज्ञान||
जपो चिर राम|
सिया वर  राम||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'
      🙏 जय श्री राम🙏
 
     🍂शुभमाल छंद🍂
शिल्प:- जगण जगण (121 121),
दो-दो चरण तुकांत,
[6 वर्ण प्रति चरण]

सजे  सुर  ताल|
मृदंग   धमाल||
करो  शुभ गान|
बजे मृदु  तान||

भजो प्रभु  नाम|
तजो दुख काम||
मिटे  सब  दोष|
रहे  नहि   रोष||

बने  सब  काम|
जपो  प्रभु राम||
कहो  घनश्याम|
सिया  वर  राम||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'
        जय श्री राम



       🍁 मंदाक्रान्ता छंद 🍁
विधान~ [{मगण भगण नगण तगण तगण+22}
( 222  211  111  221  221 22)
17 वर्ण, यति 4, 6,7 वर्णों पर, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]

झूमे  नाचे,  मुद  मगन  हो, संग  में गीत  गाएँ |
आशा रूपी, जग सुख मिले, स्नेह की डोर पाएँ ||
गंगा सी है, शुभ्र  रुपहली, पीत  की श्वेत धारा |
मोती  जैसे, नयन  चमके, रात  की  प्रीत  तारा ||
© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

Wednesday, 8 May 2019

शुभमाल छन्द (जय राम) डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

 🍂शुभमाल छंद🍂
शिल्प:- जगण जगण (121 121),
दो-दो चरण तुकांत,
[6 वर्ण प्रति चरण]

सजे  सुर  ताल|
मृदंग   धमाल||
करो  शुभ गान|
बजे मृदु  तान||

भजो प्रभु  नाम|
तजो दुख काम||
मिटे  सब  दोष|
रहे  नहि   रोष||

बने  सब  काम|
जपो  प्रभु राम||
सिया  वर  राम|
सभी सुख धाम||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'
         जय श्री राम

      शुभमाल छन्द
  जगण जगण (121 121)

हरो  दुख  पीर|
भरो  मन  धीर||
भजो  प्रभु नाम|
करो शुभ काम||

भरो  मन  आस|
हिया विभु प्यास||
रहे    सहकार |
करे   जयकार||

बली   हनुमान|
मिले सुख ज्ञान||
जपो  चिर राम|
सिया वर  राम||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'
      🙏 जय श्री राम🙏

Tuesday, 7 May 2019

बल/ बलवान पर दोहे (डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल')

🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍
                  🍂बल🍂
ज्ञान  बुद्धि  जन  शक्ति  से,  होता  है  उद्धार|
सेहत धन है बल बड़ा, कलियुग का आधार||

धीर  वीर बलवान  वो, जो  साहस  को पाय |
तन मन धन सम्पन्न हो, हनुमत सदा सहाय ||

धीरवान  ही  वीर  है, कर्मी  है  बलवान|
धर्म राह पर जो चलै, जगत करे गुणगान||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

Monday, 6 May 2019

परिवार (दिलीप कुमार पाठक 'सरस')

 परिवार ~एक पृष्ठभूमि 
शैली~व्यंग्यात्मक , सूत्रात्मक एवं उपदेशात्मक |
🌹🙏🏻🌹

🖊मानव जीवन की प्रथम पाठशाला कहा जाने वाला परिवार रीढ़ विहीन हो चुका है, इसमें साहब चौंकने वाली कोई बात नहीं है|आज भौतिकतावादी युग ने अनौपचारिकता की हत्या कर औपचारिकता को इतना बढ़ावा दिया है कि सारे रिश्ते नाते दम तोड़ते नज़र आते हैं |हम सब व्यक्तिवादिता की उस ऊँचाई पर पहुँच गये हैं, जहाँ से एक सोच जन्म लेती है और वह है आत्महत्या |स्वयं को ख़त्म करने के हमने सारे साधन जुटा लिए हैं, पल पल घुट रहे हैं, पल पल मर रहे हैं, पल पल अपनी मनमानी कर रहे हैं, पल पल एक दूसरे को नीचा दिखाने का मौका ढूँढ़ रहे हैं |साहब विकास की बात कौन करे?किसके विकास की बात करे?और क्यों विकास की बात करे? कैसे विकास की बात करे?स्वार्थ का अपच इतना बड़ गया है  ,कि पेट के साथ आँखों का भी पानी मर गया है |हाँ प्राचीनकाल के सम्बन्धों की दुहाई देते हुए, निज स्वार्थ को भुना रहे हैं| परिवार आज जीभ काढ़े पड़ा है ,अंतिम साँसों के साथ अलविदा भी कहने में बेबस बेचारा |

कभी परिवार हुआ करते थे, जिसे संयुक्त परिवार कहते हैं |पर अब परिवार औपचारिकता को पाल रहा है ,एकाकी हो गया है साहब|

पहले परिवार के किसी सदस्य पर जरा मुसीबत आयी, सब मिलकर आनन फानन में निपटा लेते थे|एक दबदबा होता था, एक रुतबा होता था परिवार का अपना, पर आज सब शून्य है |कोई किसी के साथ नहीं, कोई सहयोग नहीं, आपसी एकता का पोस्टमार्टम हो चुका है |

एकाकी परिवार दुर्मिल सवैया सा उछल कूद कर रहा है, बस संतान पालन हेतु|पर हम दे क्या रहे हैं निज संतान को, पेट दाई से छुपा नहीं है |भौतिकतावाद धमनियों में दौड़ रहा है, सम्बन्धवाद की धज्जियां उड़ रही हैं |

आज किसान की दीन हीन दशा का जिम्मेदार कौन? हमसे बेहतर आप जानते हैं, आपको पता है कि किसान हमारे देश की रीढ़ है |पर अब यह रीढ़ खोखली हो चुकी है |आज का किसान कहता है कि खेती में कुछ बचता ही नहीं, कर्ज लेना पड़ जाता है |परिवार टूटा, खेती रूठी ,आय को खा गयी शानवाद की खूँटी|बात नहीं है झूठी|परिवार टूटा, जमीन जायदाद के हिस्से हो गये, परिवार के सदस्यों में अपना-अपना घुस गया, अब साहब कहावत चरितार्थ हुई कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता |पहले सब मिलकर करते थे, एक साधन से सबका काम सब चलाते थे, पर अब तो साधन भी जुटाने हैं, साधन ठहरे महँगे, तो किराये पर लेना है, सदस्यों के अभाव में मजदूरी भी क्रय करनी है |देशी खाद क्यों? महँगे कीटनाशक डालेंगे, ज़िन्दगी कुछ तो जहरीली हो| अब भैया हम तो हो गये आलसी, अब हमसे तो काम होगा नहीं, मजबूरी ने आलस्य को जन्म दे दिया, चस्का लग गया है |अब तो हर काम हमारा रुपया करेगा,तो बचेगा क्या खाक? अब जब हम मूछों वाले बनेंगे, करेंगे कुछ नहीं तो कर्ज तो लेना ही होगा, कर्जदार व्यक्ति अपने जीवन के आनंदमयी अनमोल क्षणों को स्वयं खो देता है फिर चिंता और घुटन जीवन को जर्जर कर देती है |इसीलिए आज के व्यक्ति की आयु निरन्तर हृास की ओर उन्मुख है |
एकाकी परिवार की एक और कहानी याद आ गयी~पति पत्नी और बच्चे|कभी कभी माता पिता को रखने की मजबूरी|माता पिता को बात बात झिड़कियाँ| पत्नी जब तब कहे कि बुड्ढा बुढ़िया सटिया गये हैं, अमरफल खाये हैं, मरने का नाम तक नहीं लेते|इस तू तू में में से तंग आकर बेचारे बक्त से पहले ही निकल लेते हैं |अब बचे बच्चे वह पढ़ने बाहर चले गये, पति कमाने और पत्नी घर की दीवारों से या पड़ोसियों से सिर धुनती रहती है, किसी को किसी से बात करने की फुर्सत नहीं, और कभी मिल भी गयी तो गिले शिकवे में समय गुजर गया, बात और बड़ी तो फिर ताने जो कि लड़ाई के बाद मतभेद में बदल जाते हैं, अब साहब कौन किससे क्या बात करे?सो सब करवट बदल उधेड़बुन करते करते सो जाते हैं, सम्बन्ध अन्दर ही अन्दर रो जाते हैं |

एक और ज़िन्दगी है साहब, चकाचौंध की, जहाँ धूर्तता के दिग्दर्शन होते हैं |बड़े समझदार हैं, इनके घुले सत्तू जो खाता है, इन्हें बस वही जान सकता है |इनका जीवन सबसे ज्यादा खोखला होता है, दूसरों पर जीते हुए भी अपने को आत्मनिर्भर दिखाते हैं,यही इनके जीने की कला है|वैभव इन्हीं के हाथों का खिलौना है|

पर उपदेश कुशल बहुतेरे ~वाली कहावत चरितार्थ न होने लगे, इसलिए हम स्वयं को देखें|जो करना है स्वयं को आदेशित करें|अभी कुछ नहीं बिगड़ा, अभी बहुत कुछ सुधारा जा सकता है |अपने क्रियाकलापों को एक स्वस्थ दिशा की ओर मोड़ना है, देखते ही देखते बदलाव नज़र आने लगेगा|वसुधैव कुटुम्बकम् कुछ दिनों बाद स्वयं कहने लगेगा कि लौट के बुद्धू घर को आये|अभी समय है सुबह का भूला यदि शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते|


🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

तिलका छन्द (जयराम जपो)

🍂  तिलका छंद  🍂
शिल्प (सगण सगण (112 112)
दो दो चरण तुकांत ,6वर्ण

मन की सुन लो|
अपनी  सुन लो||
सपने  बुन   लो|
अपने  चुन  लो||

तन है  मन का|
मन है तन का||
हम साथ  चले|
मिल हाथ गले||

पग भी  महके|
जग भी महके||
भज लो महिमा|
प्रभु की गरिमा||

हिय  में  हरषे |
किरपा  बरसे||
हरते  दुख  हैं|
भरते  सुख हैं||

अविराम जपो|
सियराम जपो||
जयराम  जपो|
नित राम जपो||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'


तिलका छंद
शिल्प (सगण सगण (112 112)
दो दो चरण तुकांत ,6वर्ण

मन से कुछ तो |
अब चिंतन हो||
मुदिता मन की|
शुचिता तन की||

उर ध्यान धरो|
गुरु आत्म करो||
मन धीर धरो|
शुभ काम करो||

प्रभु नाम भजो|
मन लोभ तजो||
झुक आदर से|
निकलो घर से||

बनके बदरा|
सबके अधरा||
छवि छाँव छटा|
घनकेश घटा||

मन प्यास जगी|
कुछ आस जगी||
कर काम रुका|
चल शीश झुका ||

🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"


◆ तिलका छंद ◆
शिल्प:- [सगण सगण(112 112),
दो-दो चरण तुकांत (6वर्ण प्रति चरण)

कुछ काम करो|
जग नाम करो||
सब साथ खड़े|
मम भ्रात बड़े||

शुरुआत करो|
कुछ बात करो||
अपना अपना|
नित क्यों जपना||

तरु डाल चढ़ी |
हर वेल बढ़ी ||
जल मूल मिला|
तरु फूल खिला||

सब हाथ गहो|
सब साथ रहो||
खुशियाँ भर लो|
कुछ तो कर लो||

मन में भरना|
मन की करना||
तब क्यों डरना|
सबको मरना||

चल प्यार करें|
हर बार करें||
हँस लें सँग में|
रँग लें रँग में||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"


जय श्रीराम- जय हनुमान

🌲  🌲 शुभमाल छन्द 🌲
       जगण जगण (121 121)

हरो  दुख  पीर|
भरो  मन  धीर||
भजो  प्रभु नाम|
करो शुभ काम||

भरो  मन  आस|
हिया विभु प्यास||
रहे    सहकार |
करे   जयकार||

बली   हनुमान|
मिले सुख ज्ञान||
जपो   जयराम|
सिया वर  राम||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'
      🙏 जय श्री राम🙏🙏

Saturday, 27 April 2019

प्रिय,अनुज साहिल व अनुजवधू को पावन वैवाहिक वर्षगांठ की बहुत-बहुत बधाईयां संग आशीष🌿💐🍁☘🍀🌷🌹🌸🍫🍫🍫🍫🧁🍹🍸🍰🥣🥣

    ®℅ चौकड़िया ℅®

वैवाहिक वर्षगाँठ की भाई........
                      होवै खूब बधाई।
प्रिय साहिल जीवन साहिल संग,
                       जैवैं दूध मलाई।
सारी खुशियाँ मिलें जगत कीं,
                     कृपा करें रघुराई।
खिली रहे जीवन की बगिया,
                   घर-बाहर अमराई।
"सोम"सदा सुख सम्पत इन घर,
                नित नूतन अधिकाई।


🌿💐🌸🌹🌹🌹🍁☘🍀🌷🌷🌷🌷

आ. डॉ. राहुल साहिल दा श्री को एवं आ. कान्ति प्रभा भाभी श्री को विवाह वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

    विमोहा छंद 
शुक्ल आधार की|
है प्रभा प्यार की||
साथ साथी मिला|
फूल सा है खिला||

वर्ष है हर्ष का|
नेह आदर्श सा||
कान्ति पा दर्श की|
नैन के स्पर्श की||

नेह की देह की|
कान्ति है गेह की||
झूम के चूम के|
देखती घूम के||

कर्म के संग में|
धर्म के संग में||
प्रेम की पा गली|
साथ में जो चली ||

🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
  🎍विमोहा छंद🎍

शिल्प:- [रगण रगण(212 212),
दो-दो चरण तुकांत, 6 वर्ण]

मोर  की   मोरनी|
चाँद  की चाँदनी||
राग  की  रागिनी|
मेल  है  कामिनी||

मस्त  तू  बोलना|
बात  को तोलना||
भाव  हो  नेह  हो|
प्रेम हो  स्नेह  हो||

मान हो  गान हो|
प्रीत हो भान हो||
बोध हो  गोद हो|
मीत हो मोद हो||

रात  का  द्वंद  हो|
प्रेम का  छंद हो||
रीत  हो  गीत हो|
शब्द की जीत हो||

रंग  हो  संग हो|
रास हो ढ़ंग हो||
रूप की धार हो|
मोहिनी नार हो||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'
 
🎍विमोहा छंद🎍
शिल्प:- [रगण रगण(212 212),
दो-दो चरण तुकांत, 6 वर्ण]

प्रेम की  कामना|
स्नेह की साधना||
मोहनी  तारिका|
सोहनी सारिका||

रूप  है   राधिका|
प्रीत की साधिका||
संग   है  संगिनी|
ताल  है  रागिनी||

© साहिल